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अपना एकांत: धूपछाँही का खेल

 यह कितना अजीब है कि मैं अपने लिए एकांत एक ऐसे प्लेटफॉर्म पर ढूँढ़ रहा हूँ, जहाँ सब कुछ खुला है, जहाँ पूरी दुनिया उपलब्ध है। आज सबसे अधिक दुर्लभ चीज़ एकांत ही रह गया है। कभी यह दुनिया के शोर से उखड़ जाता है और कभी घोर अकेलेपन के कारण अप्रासंगिक हो जाता है। लोग चाहे जैसे हों, उन्हें एक एकांत की आवश्यकता तो होती ही है। मुझे भी है। लेकिन अपने एकांत को किसी तरह से गोपनीय और रहस्यमय बनाने की इच्छा नहीं है। इसलिए यह खुला मंच मुझे अधिक ठीक लगा।  पूरी दुनिया भी हो और व्यक्ति का एकांत भी।  दरअसल आदमी कभी अकेला हो नहीं सकता है। उसके एकांत को अनेकांत हरदम काटते रहते हैं। चाहे जितना निजी होने की कोशिश की जाए, सार्वजनिकता किसी-न-किसी रूप में मौज़ूद रहती है। अक्सर हमने डायरियों में देखा है, जहाँ संकेतों से काम चला लिया जाता है। लेखक को अपनी निजता उड़ेलता हुए, इतना ध्यान तो रहता ही है कि कभी यह सबके सामने भी आ सकती है। तब वह बचता भी रहता है, चलता भी रहता है। वैसे भी अपने को पूरी तरह खोलकर कौन रख सका है?  हमारी गोपनीयता और खुलापन दोनों सापेक्ष होते हैं। व्यक्ति-व्यक्ति के सापेक्ष। ह...